24-Jun-2023, Saturday
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BAGESHWAR DARBAR
हर मज़हब में अंधविश्वास और चमत्कार मौजूद हैं। मगर समस्या यह है कि हर मज़हब के अनुयायी अपने-अपने मज़हब को लेकर बहुत इमोशनल हो जाते हैं। मज़हब की कमज़ोरियों पर बहस करने की कोई परम्परा नहीं बन पाई है।
लंदन: सच्चाई तो यह है कि हर मज़हब में अंधविश्वास और चमत्कार मौजूद हैं। मगर समस्या यह है कि हर मज़हब के अनुयायी अपने-अपने मज़हब को लेकर बहुत इमोशनल हो जाते हैं। मज़हब की कमज़ोरियों पर बहस करने की कोई परम्परा नहीं बन पाई है। ऐसे में युवा पीढ़ी को रिचर्ड डॉकिन्स, क्रिस्टोफ़र हिचिन्स, और स्टीवन हॉकिन्स जैसे नास्तिकों पर अधिक विश्वास होने की संभावना है। समय आ गया है कि भारत की शास्त्रार्थ की पुरानी परंपरा को एक बार फिर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाए। यह भी संभव है कि भारत में ही इस समस्या का हल मिल सके। ‘शनि को मनाएगा सदा सुख पाएगा…!’ यह आवाज़ बचपन में अक्सर शनिवार को अपने दिल्ली की रेलवे कालोनी के घर में सुना करते थे। बाहर साधु बाबा हाथ में कमंडल लिये यह गुहार लगाते और उनके पास से सरसों के तेल की महक दूर-दूर तक महसूस की जा सकती थी। मैं तब भी सोचता था कि शनि देवता के लिये सरसों का तेल ही क्यों?
बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री को लेकर विवाद
पिछले दिनों जब बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री को लेकर अचानक विवाद उठ खड़ा हुआ तो एक बार फिर इस विषय पर सोचने को मजबूर हो गया। धीरेन्द्र शास्त्री का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्होंने दावा किया के उनकी रावण से फ़ोन पर बातचीत हुई। रावण उनसे बुंदेली भाषा में बोला, “विभीषण तो पागल था। सोचो अगर हम रामजी के पक्ष में जाते तो हमें राम जी की बग़ल में या पीछे खड़ा होना पड़ता; हम राम जी के विपक्ष में गये तो हमें राम जी के सामने खड़ा होने को मिला। विभीषण को जो रामजी के दर्शन का आनंद नहीं मिला, हमें वो दर्शन का आनंद मिला।” इस तरह के वीडियो ज़ाहिर है कि सबके मन में सवाल पैदा करते हैं। धीरेन्द्र शास्त्री चमत्कारी बाबा हैं। उनका एक पूरा साम्राज्य है। उनके बहुत से कर्मचारी हैं और उन्हें मिलने के लिये तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है, अपने लिये पर्ची बनवानी पड़ती है। तब कहीं जाकर उनके दर्शन होते हैं। दावा किया जाता है कि धीरेन्द्र शास्त्री बिना किसी भक्त को मिले या जाने उसके बारे में सब कुछ बता सकते हैं। वे किसी भी इन्सान के दिल की बातें जान सकते हैं।
श्याम मानव ने धीरेन्द्र शास्त्री के बयानों को कहा
ऐसे में महाराष्ट्र के श्याम मानव ने बाबा धीरेन्द्र शास्त्री के बयानों को सीधा-सीधा अंधविश्वास कहा और उन्हें चुनौती दे डाली। हम पुरवाई के पाठकों को बताना चाहेंगे कि श्याम मानव महाराष्ट्र के एक चर्चित अंध-विश्वास विरोधी कार्यकर्ता हैं। वे पर्सनेलिटी डेवलपमेंट की क्लास चलाते हैं… सम्मोहन विशेषज्ञ हैं और विचारक के रूप में भी लोकप्रिय हैं। वे आत्म-सम्मोहन के माध्यम से पर्सनेलिटी डेवलपमेंट की कार्यशालाएं करते हैं और बहुत से लोगों को उन्होंने आत्म-सम्मोहन की कला भी सिखाई है। यहां यह बताना उचित रहेगा कि महाराष्ट्र भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जिसमें अंधविश्वास और तांत्रिकों के जादू टोना के विरुद्ध एक कानून बनाया गया। जादू टोना विरोधी यह बिल 2004 में महाराष्ट्र विधानसभा में पेश किया गया था, लेकिन इसका काफ़ी विरोध भी हुआ था। विधान परिषद ने इसे मंजूरी नहीं दी थी। इसे 2011 में फिर से पेश किया गया था। 18 दिसंबर 2013 को ये विधेयक पारित हुआ और क़ानून बन गया। इसका नाम “महाराष्ट्र मानव बलिदान और अन्य अमानवीय, अघोरी और अत्याचारी प्रथाएं और काला जादू अधिनियम, 2013” है।
शंकराचार्य ने धीरेन्द्र शास्त्री पर सवाल उठाया
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भी बाबा धीरेन्द्र शास्त्री के दावों पर सवाल उठाया है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि वे धीरेन्द्र शास्त्री की राहों में फूल बिछा देंगे यदि अपने चमत्कार से वे जोशी मठ के घरों में आ रही दरारों को पाट दें। उन्होंने आगे कहा, “सारे देश की जनता चमत्कार चाहती है… कि कोई चमत्कार हो जाए। कहां हो रहा है चमत्कार? जो चमत्कार हो रहे हैं, अगर जनता की भलाई में उनका कोई विनियोग हो तो हम उनकी जय-जयकार करेंगे, नमस्कार करेंगे। नहीं तो ये चमत्कार छलावा है, इससे ज्यादा कुछ नहीं है।” बाबा धीरेन्द्र शास्त्री प्रकरण एक सार्वभौमिक सवाल मन में उठाता है… आस्था और अंधविश्वास में कितना अंतर है?… क्या बिना अंधविश्वास के आस्था संभव है? क्या भगवान, गॉड, अल्लाह का अस्तित्व बिना अंधविश्वास के संभव है?
मदर टेरेसा को संत घोषित करने पर सवाल
जब मदर टेरेसा को संत घोषित किया गया था, उस समय भी बहुत से सवाल उठे थे। कि क्या उन्होंने कोई चमत्कार किये थे? सवाल आदम और हव्वा के सिद्धान्त पर भी उठाए जाते हैं। विज्ञान आदम और हव्वा की थियोरी को नहीं मानता। यदि आदम और हव्वा की थियोरी को मान लिया जाए तो यह धरती केवल छब्बीस से तीस हज़ार साल पुरानी हो सकती है। क्योंकि आदम और हव्वा के बच्चों की पीढ़ियों की गिनती करने के बाद हम इसी आंकड़े पर पहुंचते हैं। ईसाई धर्म की आस्था “गॉड, दि सन एण्ड दि होली गोस्ट” में है। वे जीज़स क्राइस्ट को भगवान का पुत्र मानते हैं। और बाइबल के अनुसार सौरमण्डल के केन्द्र में धरती है और सूर्य उसके चारों ओर घूमता है। इसे आस्था कहा जाए या अंधविश्वास? सबसे पहले कोपरनीकस ने इस सिद्धान्त को ग़लत बताया था। उसे चर्च का कोपभाजन बनना पड़ा।
गैलिलियो और सुकरात तक बने चर्च के शिकार
यहां तक कि जब गैलिलियो ने टेलीस्कोप का आविष्कार करके साबित किया कि सूर्य धरती के इर्द-गिर्द नहीं घूमता बल्कि धरती सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती है तो उसे चर्च ने आजीवन कारावास का आदेश दे दिया। सन 1633 में जब गैलिलियो करीब सत्तर वर्ष के रहे होंगे, चर्च ने उन्हें सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने का आदेश दिया। उन पर ज़बरदस्ती की गयी के वे यह कहें कि धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध दिये गये उनके सिद्धान्त उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी जिसके लिये वे शर्मिंदा हैं। ऐसा न करने पर उन्हें मृत्युपरन्त कारावास में रखा गया। ग्रीस में सुकरात ने भी जब मज़हब के ख़िलाफ़ अपना मत सार्वजनिक किया तो उन्हें ज़हर का प्याला दे कर मौत के घाट उतार दिया गया।
इस्लाम में सवाल पूछने पर मनाही
ठीक इसी तरह कुरान शरीफ़ में भी धरती के चपटा होने की बात की गयी है। हालांकि बहुत से इस्लामिक विद्वान इस बात को नकारते हैं। मगर इस्लाम में सवाल पूछने पर मनाही है। आप को कुरान में आस्था और विश्वास रखना इस्लाम की पहली शर्त है। यू-ट्यूब पर आपको सैंकड़ों ऐसे वीडियो मिल जाएंगे जिनमें पादरी मौलवी सार्वजनिक रूप से मरीज़ों का इलाज मंच पर करते हैं और इन्सान के जिस्म से भूत-प्रेत निकाल बाहर करते हैं। उन सब में जनता की अगाध अंध-आस्था है। लगता है जैसे कि अंधविश्वास और आस्था मिलकर एक नई स्थिति पर पहुंच गये हैं जिसे ‘अंध-आस्था’ कहा जा सकता है।
वक्त है शास्त्रार्थ परंपरा को पुनर्जीवित करने की
विज्ञान तर्कों पर आधारित है और मज़हब अंध-आस्था पर। वैज्ञानिक का सच बदल सकता है क्योंकि जैसे-जैसे नये प्रयोग होते रहेंगे, वैसे-वैसे इन्सान की जानकारी में वृद्धि होती रहेगी। विज्ञान जड़ नहीं है, स्थिर नहीं है। विज्ञान गतिमान है, परिवर्तनशील है। एक नया वैज्ञानिक किसी पुराने सिद्धान्त के विरुद्ध एक नया सिद्धान्त प्रतिपादित कर सकता है। मज़हब में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। यहां जो बात इक किताब में हज़ारों साल पहले लिख दी गई वो पत्थर की लकीर है। सच्चाई तो यह है कि हर मज़हब में अंधविश्वास और चमत्कार मौजूद हैं। मगर समस्या यह है कि हर मज़हब के अनुयायी अपने-अपने मज़हब को लेकर बहुत इमोशनल हो जाते हैं। मज़हब की कमज़ोरियों पर बहस करने की कोई परम्परा नहीं बन पाई है। ऐसे में युवा पीढ़ी को रिचर्ड डॉकिन्स, क्रिस्टोफ़र हिचिन्स, और स्टीवन हॉकिन्स जैसे नास्तिकों पर अधिक विश्वास होने की संभावना है। समय आ गया है कि भारत की शास्त्रार्थ की पुरानी परंपरा को एक बार फिर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाए। यह भी संभव है कि भारत में ही इस समस्या का हल मिल सके। मगर इस सबसे पहले हमें मानना होगा कि अंधविश्वास धर्म के लिये घातक है।
लेखक — तेजेन्द्र शर्मा लंदन निवासी वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक